Sunday, 21 July 2019

साक्षी, पितृसत्ता और संवैधानिक नैतिकता

नैतिकता क्या है ये बड़ा सवाल है। नैतिकता की परिभाषा हर युग में बदलती रहती है। आज जो नैतिक है वो कल अनैतिक हो सकता है और जो अनैतिक है वो कल नैतिक हो सकता है। उदाहरण के तौर पर पति के नपुंसक होने या स्वर्गवासी होने पर स्त्री का किसी ग़ैरपुरुष से मातृत्व सुख पा लेना महाभारत काल मे नैतिक था। स्वयम धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म इसी प्रक्रिया के तहत हुआ। उनके जैविक पिता व्यास मुनि थे। इस प्रथा को नियोग कहा गया। आज के दौर में ऐसा होता तो यह अनैतिक होता। सामान्यतः हर दौर में जो वर्ग शासक होता है वही नैतिकता की परिभाषा और नियम तय करता है। उदाहरण के तौर पर चन्देल राजपूतो के दौर में बने खजुराहो के मन्दिरो में प्रणयरत मूर्तियो का निर्माण अनैतिक नही था। दक्षिण के मन्दिरो में देवदासियों का अस्तित्व उस दौर की नैतिकता थी। आज यह गैरकानूनी है। पति की मौत होने पर उसकी जलती चिता पर महिला को फेंक देना भारतीय समाज को अनैतिक नही लगता था। यही कारण है कि संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने समाज द्वारा स्थापित नैतिकता के मानको से इतर संवैधानिक नैतिकता की बात की। लोकतंत्र में नैतिकता की परिभाषा संविधान से तय होती है शासक वर्ग से नहीं।
फिलहाल सामाजिक नैतिकता खतरे में पड़ गयी है क्योंकि बरेली में सत्तारूढ़ दल के विधायक की बेटी ने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर एक दलित से शादी कर ली। साक्षी के पिता ब्राह्मण होने के साथ ही बाहुबली भी है। समाज में नैतिकता के स्वयम्भू ठेकेदारों ने अपने दिमाग मे भरा गोबर निकाल कर सोशल मीडिया पर उड़ेल दिया है। कुछ अखबार और चैनलों में साक्षी के पति अजितेश के चरित्र पर कीचड़ उछालना शुरू हो गया। भारत मे मीडिया अक्सर ही जज बन कर फैसला सुना देता है। फ़ेसबुक में समाज के कथित बुद्धिजीवी वर्ग के कमेंट पढिये तो पता चलेगा कि देश इक्कीसवी सदी में पहुँच गया है लेकिन इन्हें अभी भी मध्यकाल से प्रेम है।
साक्षी ने पिता से विद्रोह कर अंतरजातीय विवाह किया। अयोध्या के एक महंत का कहना है कि यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। वैसे रुक्मिणी ने भी अपने पिता के विरुद्ध जाकर कृष्ण से विवाह किया था। कृष्ण यादव थे और रुक्मिणी क्षत्रिय। अजितेश का दलित होना भी सवर्ण समाज के आंदोलित होने की वजह है। सोशल मीडिया पर साक्षी को कोसने वाले भी ज्यादातर सवर्ण समाज से है। इनके लिखे उद्गारो में साक्षी का उदाहरण देकर भ्रूणहत्या को जायज ठहराया जा रहा है। एक बुद्धिजीवी ने कहा दिया कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाओगे तो यही होगा। इस तरह के समाज मे लड़कियां ऑनर किलिंग से लेकर भ्रूण हत्या का शिकार बनती है तो कैसा आश्चर्य। आंकड़ो के मुताबिक साल 2018 के सितंबर से पिछ्ले 3 सालो तक ऑनर किलिंग के 300 मामले दर्ज हुए। अकेले साल 2015 में ही 251 लड़कियों को को उन्ही के परिवारीजनों नें मार डाला क्योंकि इन लड़कियों नें अपनी मर्जी से प्रेम किया और शादी की। यह आंकड़ा साल 2014 से 79.6 प्रतिशत ज्यादा है।
शुक्र है कि भारत मे विधि का शासन है और संविधान की रक्षा करने के लिये न्यायपालिका है। इलाहाबाद हाइकोर्ट ने साक्षी की शादी को मान्यता देते हुए नवदम्पत्ति को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया लेकिन उससे पहले ही कोर्ट की चौखट पर कुछ कथित अधिवक्ताओ ने अजितेश और साक्षी से मार पीट करने की कोशिश की। पितृसत्तात्मक समाज मे महिला और दलित दोनों समान धरातल पर खड़े मिलते है। ब्राह्मणवाद पितृसत्तात्मकता और सामन्तवाद का निकृष्टतम रूप है। साक्षी का अस्तित्व ही इनके लिये खतरा है। डर है कि आज इसने किया तो कल बाकी सवर्ण लड़कियां भी ऐसा कर सकती है। इनके लिए स्त्रियां योनि मात्र है और परिवार का सम्मान योनि की पवित्रता में समाहित है। पुरूष इस मामले में स्वछंद है। भागती केवल लड़कियां है। लड़के तो स्थिरप्रज्ञ है। ब्राह्मण समाज आंदोलित है क्योंकि साक्षी ने एक दलित से शादी कर ली है। ब्राह्मणों की पंचायत में इस तरह की शादियों पर रोक लगाने की बाते हो रही है। वैसे साक्षी के पिता एमएलए है वो भो एक ऐसी पार्टी से जिसका उद्देश्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है लेकिन हिन्दूओ में ही आपस मे रोटी बेटी का संबंध नही है। दलित अजितेश और ब्राह्मण साक्षी की शादी ब्राह्मणत्व का अपमान है। इस सामन्तवादी हिंदुत्व के लिये दलितों का कोई मूल्य नही है। आजादी के पहले तक तो दलितों के नायक भी हाशिये पर थे। इसी ब्राह्मणवाद ने केरल के तटीय इलाकों में दलित महिलाओं को अपने वक्ष तक ढकने नही दिया। 150 साल पहले स्तन ढकने के अधिकार के लिए दलित स्त्री ननगेली ने लड़ाई लड़ी और विरोध स्वरूप अपने दोनों स्तन काट डाले लेकिन देश की हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार ने इस संघर्ष का जिक्र सीबीएसई की कक्षा 10 की पाठ्य पुस्तक से हटा दिया। काशी में दलितों पर अत्याचार के घृणित तरीको को दर्शाती फ़िल्म शूद्र पर प्रतिबंध लगा और हाल ही में आयी फ़िल्म आर्टिकल 15 पर विवाद हो गया। सच तो यह है कि दलित समाज इस कथित हिंदुत्व की परिभाषा में शामिल ही नही है। रामचरितमानस में ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी कहने वाले तुलसीदास ने दलित, स्त्री और जानवर को एक ही वर्ग में रखा। भला हो बाबा साहब अम्बेडकर का जिन्होंने दलितों के अलावा हिन्दू कोड बिल का निर्माण कर स्त्री को भी हजारों साल की दासता से मुक्त किया लेकिन आज भी लोगो को रामराज भारतीय संविधान के शासन से ज्यादा अच्छा समझ आता है।
वैसे साक्षी को पिता द्वारा चुने गये पुरुष के साथ ही सोने के हिमायती लोग जब हलाला का विरोध करते है तो उनकी अक्ल पर तरस खाया जा सकता है। आखिरकार हलाला में भी स्त्री पितृसत्ता के आदेशों का ही पालन करती आयी है। फिर इसका विरोध करने का क्या मतलब।
कुछ माता-पिता अक्सर एहसान जताते हुए बच्चों को धमकाते हैं कि हमने तुमको पैदा किया है जबकि हक़ीक़त यह है कि पाँच मिनट के कार्यक्रम के बाद आगे की प्रक्रिया पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहता। आगे जो होता है, वह कुदरत करती है। पिता या माता केवल जरिया मात्र होते हैं। लेकिन इनको अहंकार इतना है कि इनसे बड़ा सृजनकर्त्ता कोई नहीं है।
साक्षी आजाद है और उत्तरप्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता ने कभी लिखा था कि आजाद स्त्रियां डायन होती है।
लेकिन साक्षी जैसी लड़कियां पैदा होती रहेंगी। प्रेम का यह स्वभाव है कि वह मनुष्य द्वारा स्थापित जाति, धर्म और अमीर-गरीब के कृतिम विभाजन को नही मानता। यही कारण है कि समाज से निकलने वाली अधिकांश प्रेम कहानियाँ अंतरजातीय या अंतर्धार्मिक होती हैं। प्रेम वर्ग सत्ता के विरुद्ध प्रथम विद्रोह है। मीरा का प्रेम भी ऐसा ही था। राजपूत वंश की वधू का राजमहल की दहलीज पार कर जनसामान्य की चेतना से एकाकार हो जाना उस दौर में बहुतो को अनैतिक लगा तो मीरा को जहर दे दिया गया। राधा-कृष्ण की मूर्ति मन्दिर में रखकर चंदा बटोरने वाले लोग अपने आस-पड़ोस में प्रेम के दुश्मन बन जाते है। यह इनकी नैतिकता है लेकिन हाईकोर्ट के फैसले ने साफ कर दिया है कि देश तो संवैधानिक नैतिकता पर ही चलेगा।

Monday, 1 July 2019

दीन और बिस्तर के बीच जी रही मुस्लिम औरत



बांसमंडी में रहने वाली आलिया (बदला हुआ नाम) को बाक्सिंग का शौक है। उसका चचेरा भाई ग्रीन पार्क में क्रिकेट सीखने जाता था तो उसे पता चला कि वहां बाक्सिंग भी सिखाई जाती है। लेकिन कट्टर मजहबी परिवार से ताल्लुक रखने वाली आलिया को इस बात की इजाजत नही है कि वह बिना परदे के बाहर निकले। उसका दाखिला भी इलाके के ऐसे स्कूल में हुआ है जहां केवल मुस्लिम लड़कियां ही पढ़ सकती हैं। बाक्सिंग सीखने जायेंगी तो बुर्का उतार कर स्पोर्ट्स किट में घर से बाहर निकलना पड़ेगा जो उनके परिवार और आस पड़ोस को हरगिज मंजूर नही होगा। हीरामन का पुरवा में रहने वाली सादिया(बदला हुआ नाम) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सादिया को मेडिकल की पढ़ाई करने के लिये बाहर नही जाने दिया गया क्योंकि घर वालों का कहना था बेटी की पढ़ाई परदे के दायरे के भीतर ही जायज है और इस दायरे से बाहर निकलना हराम है। वैसे जब सादिया की चाची की डिलिवरी का वक्त आया तो इनके पड़ोसी ने एक निजी अस्पताल में जाने की सलाह दी क्योंकि वहां की महिला डाक्टर काफी काबिल थी। ये अलग बात है क वह गैर मुस्लिम थी।
दीन और दुनिया में से किसी एक को चुनना भारतीय मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी गफलत है। यही वजह है कि सन 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत के 42.72 प्रतिशत मुसलमान अनपढ़ हैं जबकि धार्मिक आधार पर हिन्दुओं के बाद सबसे बड़ी तादाद मुस्लिमों की ही है। मुस्लिम महिलाओं की बात करें तो हालत ज्यादा खराब है। जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि केवल 25.29 प्रतिशत मुस्लिम महिलाऐं ही पढ़ी लिखी हैं जिसमें 11.51 प्रतिशत प्राइमरी एजुकेशन से आगे नहीं बढ़ पायीं है। 7.32 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने  कक्षा 8 तक पढने के बाद स्कूल छोड़ दिया जबकि 4.63 प्रतिशत महिलाऐं सेकेन्डरी तक और 3.31 प्रतिशत हायर सेकेन्डरी तक पहुँच पायीं। इन आंकड़ों के मुताबिक उच्च शिक्षा के क्षे़त्र में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति ढूँढ़ते रह जाओगे वाली है। केवल 1.75 प्रतिशत महिलाएं ही उच्च शिक्षा यानी ग्रेजुएशन और उससे आगे तक पहुच पाती हैं जबकि 0.12 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओें के पास टेक्निकल या नॉन टेक्निकल डिप्लोमा है।
लेकिन अफसोस इस बात का है इस समाज में महिलाओ की शिक्षा जैसे टापिक कभी मुद्दा नहीं बनते। पूरी दुनिया इक्कीसवी सदी में पहुच गयी है लेकिन मुसलमान है कि मध्यकालीन सोच को छोड़ने के लिये तैयार नही है। अगर कोई महिला इन रूढ़ियों को तोड़ने की हिम्मत दिखाती है तो मर्दवादी इस्लामी समाज उसके पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ जाता है। ऐसे लोगों के लिये औरत का मतलब बिस्तर की जीनत और बच्चे पैदा करने की मशीन से ज्यादा नहीं है। शायद यही वजह है कि यह समाज जायरा की आजाद पहचान को बर्दाश्त नही कर पाता और उसे वापस बुर्के में कैद होता देख कर खुश होता है। इन्हे लेडी डाक्टर तो चाहिये लेकिन इनके समाज से कोई महिला डाक्टरी पढ़ने की ख्वाहिश लिये बाहर निकलने की कोशिश करे तो नाजुक सा दीन खतरे में आ जाता है। जायरा वसीम की पोस्ट पर होने वाले कमेंट्स को पढ़ कर समझ नही आता कि यह समाज औरत और उसके शरीर को लेकर इतना ज्यादा कुंठित क्यों है। तमाम मजहबी कट्टरपंथी इसे जायरा का निजी मामला बता कर उसकी हिमायत कर रहे है। इन्हे हर उस महिला से नफरत है जो इनके समाज का रोल मॉडल बन सकती है। जायरा कश्मीर से आती है जहाँ कट्टरपंथी हर उस महिला को खाने क लिए तैयार बैठे है जो आजाद सोच रखती है। यहा के लोगो की मानसिकता की झलक देखनी हो तो घाटी कि पहली महिला रेडियो जॉकी के फेसबुक पेज पोस्ट किये जाने वाले कमेंटो को पढिये। इन कमेंटो में उसे कोसा जाता है क्योंकि वह हिजाब नहीं पहनती और संगीत के क्षेत्र में काम करती है जोकि इस्लाम में हराम है। मजहब की बेडिंयां तोड़ कर अपने-अपने क्षे़त्र में मुकाम बनाने वाली मुस्लिम महिलाओं की काबिलियत की तारीफ करने की बजाय उन्हे हिजाब नही पहनने और उनके पहनावे पर बेहूदा और अश्लील कमेन्ट करने का जैसे दस्तूर बन गया है।
जायरा कहती है कि वह वासना और इच्छाओं के चलते बहक गयी थी और अब वह अल्लाह के रास्ते पर चलना चाहती है। 18 साल की जायरा अपने फैसले लेने के लिये आजाद है। लेकिन उन हजारों लड़कियों का क्या जो उनकी कम्युनिटी से आती है और जायरा की कामयाबी ने उनके हौंसलों को पंख देना षुरू कर दिया था। जैसा कि तस्लीमा नसरीन अपने ट्वीट में कहती है कि मुस्लिम समाज ने न जाने कितनी प्रतिभाओं को बुर्के में कैद कर दिया। वैसे धर्म के रास्ते पर चल कर वासना को खत्म किया जा सकता तो जायरा के फैसले पर वाह वाह कर रहे कट्टरपंथियों की औलादें न होती।

Saturday, 6 April 2019

यह भारत की सेना है, मोदी जी की नहीं


1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष को कुचलने के बाद ब्रिटेन के तत्कालीन भारत सचिव ने भारत के अंग्रेजी गवर्नर जनरल को एक पत्र में लिखा कि मैं भारतीय सेना को इस तरह विभाजित देखना चाहूंगा  कि अगर एक रेजिमेंट विद्रोह करे तो दूसरी को उसपर गोली चलाने में संकोच न हो। यहां से अंग्रेजो की नई थ्योरी की शुरुआत हुई जिसमे उन्होंने कहा कि भारत मे कुछ लड़ाकू जातियां है और कुछ गैर लड़ाकू जातियाँ है।
फिर अवध (अब का यूपी) और बिहार के लोगो को गैर लड़ाकू जातियाँ घोषित कर सेना में लिया जाना बंद कर दिया गया जबकि ईस्ट इंडिया कम्पनी के शुरुआती दौर में इन्ही लोगो ने अंग्रेजो को पूरा हिंदस्तान जीतने में मदद की।  इसके विपरीत सिखों, गोरखों और राजपूतो को लड़ाकू जाति घोषित किया गया क्योंकि अंग्रेजो ने इन्ही के सहयोग से 1857 का विद्रोह कुचला था। इसके बाद ही भारतीय सेना में जातियों के आधार पर विभाजन की शुरुआत हुई और सिख जाट राजपुताना गोरखा आदि रेजिमेंट बनीं। सेना में राष्ट्रीय गौरव के स्थान पर जातीय गौरव को प्रोत्साहित किया गया। वैसे इस का एक लाभ भी हुआ कि भारत की सेना राजनीति से दूर रही जबकि पाकिस्तान में ऐसा नही हुआ। इसका दूसरा पहलू भी है कि जब 1946 में अंग्रेजो के खिलाफ बम्बई में नौसेना ने विद्रोह कर दिया तो नेहरू और पटेल ने इस विद्रोह की कड़ी आलोचना की और उनसे तुरन्त हथियार डालने को कहा। इसकी आलोचना की जा सकती है मगर इसके पीछे सेना को राजनीति से परे रखने की सोच थी और शायद इसी वजह से भारत मे लोकतंत्र सुरक्षित रहा।
ध्यान देनेवाली बात यह है कि आजाद हिंद फौज के समर्पण के बाद ऐतिहासिक लाल किला मुकदमा चला जिसमे आजाद हिंद फौज के कर्नल शाहनवाज , ढिल्लो और सहगल को दोषी ठहराया गया। हालांकि उनकी पैरवी करने के लिए दशको बाद जवाहर लाल नेहरू ने वकील का चोगा पहना था और कैलाशनाथ काटजू जैसे वकीलों ने पैरवी की थी। इन सबको सजा हुई मगर सारे देश मे प्रदर्शन हुए जिसके बाद वॉइसराय माउंटबेटन ने इन सबकी सजा माफ कर दी।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आजाद हिंद फौज के एक भी सिपाही को वापस भारतीय सेना में नही लिया गया। वैसे आजाद हिंद फौज उस समय अंग्रेजो की बनाई भारतीय सेना की तुलना में सच्चे अर्थों में भारतीय राष्ट्रीय सेना थी।
उसके बाद जब नेहरू के भारतीय सेना के जनरल और आजाद भारत के पहले 5 सितारा फील्ड मार्शल करियप्पा से मतभेद हुए तो उनके रिटायर होने के तुरंत बाद भारतीय सेना को थल जल और नौ सेना में विभाजित कर दिया गया और तीनों सेनाओं के अलग अलग प्रमुख बनाये गए।
यह भी नेहरू की देन रही कि उस समय जब तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों में पश्चिमी शक्तियों से आजादी के बाद सैनिक शासन कायम हो गया, भारत मे सेना राजनीति से कोसो दूर रही और लोकतंत्र के प्रति वफादार रही।
 अब मोदी की सेना जैसे बयान आते है तो यह डर लगने लगता है कि सेना गैर राजनीतिक रह पाएगी

नेगेटिव होना

मैं नेगेटिव हो जाता हूँ
जब उठाता हूँ सवाल
होने पर और न होने पर,
मैं नेगेटिव हो जाता हूँ
जब मैं सोचता हूँ
कि यह जो है वह क्यों है।
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि मुझे दिखती है
उधड़ी  खाल और रिसता हुआ खून।
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि मैंने देखी है
सुबह की ट्रेन से जाते मजदूर,
उनके टिफिन की सुखी रोटियां
जवानों की लाशें
रोटी हुई माँ
चूड़ी तोड़ती पत्नी
बिना बाप के बच्चे
और उनकी शव यात्रा में हंसते हुए लोग
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि मैंने देखा है जलते अरमानो की रोशनी में चमकता विकास
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि देख लेता हूँ
मन्दिर और मजारो के बाहर
 ठंड में ठिठुरते भिखारी
पहचान लेता हूँ
कलम के जिगोलो को
महसूस कर लेता हूँ
जेठ की दुपहरी में
गंगा की रेती पर बैठे निराला का दर्द
अगर ये नगेटिव होना है तो...
हा मैं नेगेटिव हूँ।