Saturday, 6 April 2019

यह भारत की सेना है, मोदी जी की नहीं


1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष को कुचलने के बाद ब्रिटेन के तत्कालीन भारत सचिव ने भारत के अंग्रेजी गवर्नर जनरल को एक पत्र में लिखा कि मैं भारतीय सेना को इस तरह विभाजित देखना चाहूंगा  कि अगर एक रेजिमेंट विद्रोह करे तो दूसरी को उसपर गोली चलाने में संकोच न हो। यहां से अंग्रेजो की नई थ्योरी की शुरुआत हुई जिसमे उन्होंने कहा कि भारत मे कुछ लड़ाकू जातियां है और कुछ गैर लड़ाकू जातियाँ है।
फिर अवध (अब का यूपी) और बिहार के लोगो को गैर लड़ाकू जातियाँ घोषित कर सेना में लिया जाना बंद कर दिया गया जबकि ईस्ट इंडिया कम्पनी के शुरुआती दौर में इन्ही लोगो ने अंग्रेजो को पूरा हिंदस्तान जीतने में मदद की।  इसके विपरीत सिखों, गोरखों और राजपूतो को लड़ाकू जाति घोषित किया गया क्योंकि अंग्रेजो ने इन्ही के सहयोग से 1857 का विद्रोह कुचला था। इसके बाद ही भारतीय सेना में जातियों के आधार पर विभाजन की शुरुआत हुई और सिख जाट राजपुताना गोरखा आदि रेजिमेंट बनीं। सेना में राष्ट्रीय गौरव के स्थान पर जातीय गौरव को प्रोत्साहित किया गया। वैसे इस का एक लाभ भी हुआ कि भारत की सेना राजनीति से दूर रही जबकि पाकिस्तान में ऐसा नही हुआ। इसका दूसरा पहलू भी है कि जब 1946 में अंग्रेजो के खिलाफ बम्बई में नौसेना ने विद्रोह कर दिया तो नेहरू और पटेल ने इस विद्रोह की कड़ी आलोचना की और उनसे तुरन्त हथियार डालने को कहा। इसकी आलोचना की जा सकती है मगर इसके पीछे सेना को राजनीति से परे रखने की सोच थी और शायद इसी वजह से भारत मे लोकतंत्र सुरक्षित रहा।
ध्यान देनेवाली बात यह है कि आजाद हिंद फौज के समर्पण के बाद ऐतिहासिक लाल किला मुकदमा चला जिसमे आजाद हिंद फौज के कर्नल शाहनवाज , ढिल्लो और सहगल को दोषी ठहराया गया। हालांकि उनकी पैरवी करने के लिए दशको बाद जवाहर लाल नेहरू ने वकील का चोगा पहना था और कैलाशनाथ काटजू जैसे वकीलों ने पैरवी की थी। इन सबको सजा हुई मगर सारे देश मे प्रदर्शन हुए जिसके बाद वॉइसराय माउंटबेटन ने इन सबकी सजा माफ कर दी।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आजाद हिंद फौज के एक भी सिपाही को वापस भारतीय सेना में नही लिया गया। वैसे आजाद हिंद फौज उस समय अंग्रेजो की बनाई भारतीय सेना की तुलना में सच्चे अर्थों में भारतीय राष्ट्रीय सेना थी।
उसके बाद जब नेहरू के भारतीय सेना के जनरल और आजाद भारत के पहले 5 सितारा फील्ड मार्शल करियप्पा से मतभेद हुए तो उनके रिटायर होने के तुरंत बाद भारतीय सेना को थल जल और नौ सेना में विभाजित कर दिया गया और तीनों सेनाओं के अलग अलग प्रमुख बनाये गए।
यह भी नेहरू की देन रही कि उस समय जब तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों में पश्चिमी शक्तियों से आजादी के बाद सैनिक शासन कायम हो गया, भारत मे सेना राजनीति से कोसो दूर रही और लोकतंत्र के प्रति वफादार रही।
 अब मोदी की सेना जैसे बयान आते है तो यह डर लगने लगता है कि सेना गैर राजनीतिक रह पाएगी

नेगेटिव होना

मैं नेगेटिव हो जाता हूँ
जब उठाता हूँ सवाल
होने पर और न होने पर,
मैं नेगेटिव हो जाता हूँ
जब मैं सोचता हूँ
कि यह जो है वह क्यों है।
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि मुझे दिखती है
उधड़ी  खाल और रिसता हुआ खून।
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि मैंने देखी है
सुबह की ट्रेन से जाते मजदूर,
उनके टिफिन की सुखी रोटियां
जवानों की लाशें
रोटी हुई माँ
चूड़ी तोड़ती पत्नी
बिना बाप के बच्चे
और उनकी शव यात्रा में हंसते हुए लोग
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि मैंने देखा है जलते अरमानो की रोशनी में चमकता विकास
मैं नेगेटिव हूँ
क्योंकि देख लेता हूँ
मन्दिर और मजारो के बाहर
 ठंड में ठिठुरते भिखारी
पहचान लेता हूँ
कलम के जिगोलो को
महसूस कर लेता हूँ
जेठ की दुपहरी में
गंगा की रेती पर बैठे निराला का दर्द
अगर ये नगेटिव होना है तो...
हा मैं नेगेटिव हूँ।